लेखक: आयुष कुमार यादव | 25 सितंबर, 2026
पिछले कुछ हफ्तों से मैं यह पोस्ट लिखने की सोच रहा था, लेकिन हर बार शुरू करता तो लगता जैसे कुछ छूट रहा है। फिर IIT बॉम्बे की खबर आई, और मुझे समझ आया कि मैं क्या ढूंढ रहा था — यह लिखना सिर्फ “एक और सरकारी सर्कुलर की खबर” नहीं हो सकता। यह उन बच्चों की बात है जिन्हें हम हर साल खो रहे हैं, और उस देर से आई समझ की बात है जो शायद अभी भी काफी नहीं है।
तो चलिए सीधे मुद्दे पर आते हैं: IIT दिल्ली ने हाल ही में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और पढ़ाई के दबाव को लेकर कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जो, अगर ईमानदारी से लागू हों, तो वाकई एक मिसाल बन सकते हैं। लेकिन पहले यह समझना जरूरी है कि यह कदम आया क्यों।
असली वजह — आंकड़े जो नींद उड़ा दें
बात सिर्फ एक-दो घटनाओं की नहीं है। 2006 से 2026 के बीच IITs में 171 छात्रों की आत्महत्या या अस्वाभाविक मौत दर्ज हुई है। सिर्फ पिछले पांच साल (2020-21 से 2024-25) में यह आंकड़ा 53 तक पहुंच गया, और परेशान करने वाली बात यह है कि इनमें आधे से ज्यादा छात्र SC, ST या OBC वर्ग से थे।
2026 का साल तो और भी भारी रहा — इस साल अब तक 10 IIT छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। इनमें अगस्त में IIT दिल्ली के रिशिकेश कुमार, और सितंबर में IIT बॉम्बे के साहिल वाकोड़े का नाम शामिल है। साहिल की मौत ने खासतौर पर हलचल मचाई — परीक्षा के दौरान मोबाइल और ChatGPT इस्तेमाल करने के आरोप में उन्हें हॉल से बाहर निकाला गया था, और उनके परिवार ने जातिगत उत्पीड़न का आरोप लगाया। इसके बाद संबंधित प्रोफेसर पर SC/ST एक्ट और आत्महत्या के लिए उकसाने की FIR दर्ज हुई, और IIT बॉम्बे को बाद में सफाई देनी पड़ी।
2025 में सुप्रीम कोर्ट भी इस पर सख्त हो चुका है। एक मामले में जब IIT दिल्ली ने FIR दर्ज करने से बचने की कोशिश की, तो कोर्ट ने न सिर्फ फटकार लगाई बल्कि 10 सदस्यों की एक नेशनल टास्क फोर्स भी बना दी। जनवरी 2026 में कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि कैंपस में होने वाली किसी भी आत्महत्या की सूचना अब स्थानीय पुलिस को देना अनिवार्य होगा।
यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें अब IIT दिल्ली के इन सुधारों को देखना चाहिए — मजबूरी में उठाया गया कदम या सच में बदलाव की नीयत, यह वक्त बताएगा।
अब बात करते हैं — बदला क्या है
CGPA की अनिवार्यता खत्म
2024-25 से IIT दिल्ली ने डिग्री के लिए न्यूनतम CGPA (पहले आमतौर पर 5.0-6.0) की शर्त हटा दी है। यह सुनने में छोटी बात लग सकती है, लेकिन जो छात्र हर सेमेस्टर “पास होने” के डर में जीते थे, उनके लिए यह एक बड़ी राहत है। मुझे लगता है यही सबसे बुनियादी बदलाव है — जब पढ़ाई सिर्फ स्कोर करने के लिए नहीं, सीखने के लिए हो, तो नतीजे भी बेहतर आते हैं।
वर्कलोड घटा, वीकेंड एग्जाम पर लगाम
2025 के नए करिकुलम में पहले सेमेस्टर का क्रेडिट लोड कम किया गया है और वीकेंड परीक्षाओं को न्यूनतम रखने की कोशिश हो रही है। साथ ही अब “लाइफ स्किल्स” जैसे विषय भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बन गए हैं — यानी सिर्फ इंजीनियरिंग नहीं, जिंदगी जीना भी सिखाया जाएगा।
छोटी क्लासें, ज्यादा ध्यान
फर्स्ट ईयर की डिपार्टमेंटल क्लासों का साइज अब 30-60 छात्रों तक सीमित कर दिया गया है, ताकि प्रोफेसर हर छात्र को ठीक से जान सकें और बच्चे सवाल पूछने में झिझकें नहीं।
मानसिक स्वास्थ्य सहायता — और इस बार सिर्फ कागज़ पर नहीं
यह हिस्सा शायद सबसे अहम है। संस्थान ने 24×7 काउंसलिंग और साइकियाट्रिस्ट सपोर्ट शुरू किया है, जिसमें AIIMS और VIMHANS जैसे संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल हैं। इससे भी बड़ी बात — अगर कोई छात्र बाहर से इलाज कराना चाहे, तो उसका पूरा खर्च अब IIT दिल्ली उठाएगा। यह किसी भी नीति से ज्यादा मायने रखता है, क्योंकि सच यह है कि ज्यादातर छात्रों के पास प्राइवेट थेरेपी अफोर्ड करने के पैसे नहीं होते। इसके साथ एक इमरजेंसी रिस्पॉन्स प्रोटोकॉल और हर अकादमिक यूनिट में एक वेलनेस कमेटी भी बनाई गई है।
बडी़ प्रोग्राम अब सबके लिए
पुराना UG बडी़ प्रोग्राम, जिसमें नए छात्रों को एक सीनियर से जोड़ा जाता था, अब 2025 से PG और इंटरनेशनल छात्रों तक भी बढ़ा दिया गया है। अकेलापन शायद सबसे कम बात होने वाली समस्या है, और यह कदम सीधे उसी पर वार करता है।
पीछे छूट गए छात्रों के लिए शाम की क्लासें
2023 से चल रहा Academic Progress Group अब पिछड़ रहे छात्रों को बिना किसी शर्मिंदगी के इवनिंग ट्यूशन और बैकलॉग सपोर्ट देता है। यह छोटी बात नहीं है — अक्सर छात्र सिर्फ इसलिए मदद नहीं मांगते क्योंकि उन्हें लगता है यह कमजोरी मानी जाएगी।
भेदभाव की शिकायत अब गोपनीय रूप से
एक सेंट्रलाइज्ड ERP पोर्टल के जरिए छात्र अब जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्र या किसी भी आधार पर हुए भेदभाव की शिकायत गोपनीय तरीके से दर्ज करा सकते हैं, जिसे एक ट्रैकिंग नंबर मिलता है। अलग से SC/ST और OBC सेल भी काम कर रहे हैं, और 2022 से बना Office of Diversity and Inclusion इन मुद्दों पर लगातार नजर रखता है।
योग और ध्यान — कोई नई बात नहीं, पर जारी है
2001 से चल रहा National Resource Centre for Value Education in Engineering छात्रों को योग और मेडिटेशन के जरिए दीर्घकालिक संतुलन सिखाने का काम कर रहा है — यह याद दिलाता है कि प्रिवेंशन भी उतना ही जरूरी है जितना इलाज।
दूसरे IITs भी पीछे नहीं
IIT खड़गपुर में शाम को पावर ब्लैकआउट किया जाता है ताकि छात्र फोन-लैपटॉप छोड़कर आपस में बात करें। IIT गुवाहाटी का ‘Know Your Neighbour’ अभियान और उनका होलिस्टिक वेलबीइंग सेंटर भी इसी दिशा में एक कोशिश है। और दिसंबर 2025 तक देश के सभी 23 IITs में मिलाकर 108 काउंसलर तैनात किए जा चुके हैं।
अब सवाल यह है — क्या यह काफी है?
ईमानदारी से कहूं तो, नीतियां अच्छी दिखती हैं। पर मेरा असली सवाल यह है कि जमीन पर इनका असर कितना है।
क्या एक प्रोफेसर, जिसे सालों से सिर्फ रिजल्ट के आधार पर आंका गया, अचानक एक छात्र की मानसिक स्थिति पहचानना सीख जाएगा? क्या 24×7 हेल्पलाइन का नंबर सच में हर छात्र तक पहुंचता है, या सिर्फ नोटिस बोर्ड की शोभा बढ़ाता है? और सबसे बड़ी बात — मदद मांगना अभी भी हमारे यहां “कमजोरी” क्यों माना जाता है?
यह सुधार सही दिशा में हैं, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन इनकी असली परीक्षा तब होगी जब अगली बार कोई छात्र संकट में हो और यह देखना होगा कि सिस्टम वाकई उसके साथ खड़ा होता है या नहीं।
आखिर में
अगर आप किसी IIT या किसी और संस्थान से जुड़े हैं, तो यह सवाल खुद से पूछिए — क्या आपके यहां भी छात्र की भलाई सिर्फ नंबरों से ज्यादा मायने रखती है? कमेंट में अपनी राय जरूर बताएं, खासकर अगर आपने खुद कभी पढ़ाई के दबाव से जूझा हो।
संदर्भ:
- IIT Delhi Press Release — Student Well-Being Measures, अगस्त 2026
- India Today — IIT Delhi expands mental health support, सितंबर 2026
- Aaj Tak — IIT Delhi Mental Health Reforms, सितंबर 2026
- The Print — 10 IIT student suicides in 2026
यह लेख मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या जैसे संवेदनशील विषय पर है। अगर आप या आपका कोई परिचित मानसिक तनाव से गुजर रहा है, तो कृपया किसी काउंसलर, डॉक्टर या हेल्पलाइन से बात करें — इसमें झिझकने की कोई जरूरत नहीं है।